क्यों है मोदी और भागवत के विचार अलग

क्यों है मोदी और भागवत के विचार अलग

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आरएसएस और बीजेपी दोनों ही एक दूसरे के पूरक रहें है! पर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस ) मोहन भागवत के बयान एक.दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं! इससे दो सवाल पैदा हो रहे हैं! पहला ये कि दोनों लोग अपने अलग.अलग बयानों से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं और दूसरा ये कि इनमें से किसकी बात को जायज ठहराया जाए!

गोरक्षा के नाम पर देश के विभिन्न हिस्सों में हुए उपद्रव और उसे लेकर केंद्र सरकार की किरकिरी के बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान का देश के राजनीतिक व सामाजिक हलकों में निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं! बीते माह गुजरात के उना में गोरक्षा के नाम पर जब कुछ दलित युवकों को बेरहमी से पीटा गया! यहां भारी तादाद में दलित समुदाय के लोग विरोध में सड़कों पर उतरे तब पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि गोरक्षा के नाम पर उपद्रव मचाने वाले अस्सी फीसद लोग आपराधिक प्रवृत्ति के हैं! पीएम ने राज्य सरकारों से ऐसे लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़े कदम उठाने की अपील की थी! मगर इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लग सका!

गोरक्षकों पर मोदी और भागवत के बयानों की! जिसमें दोनों लोगों ने अलग.अलग बयान देकर एक नई बहस छेड़ दी है! संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान ऐसे समय आया हैए जब उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में विधानसभा के चुनाव निकट हैं और वहां दलितोंए मुसलमानों की नाराजगी बुरा असर डाल सकती है! ऐसे में कुछ लोगों का कहना हो सकता है कि भागवत का बयान इन चुनावों के मद्देनजर आया हैए क्योंकि भागवत ने संघ के स्थापना दिवस पर न सिर्फ गोरक्षा के नाम पर उपद्रव करने वालों को आड़े हाथों लियाए बल्कि आतंकवाद के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई और मोदी प्रशासन की भी प्रशंसा की!

अब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि गोरक्षकों को उपद्रवियों की श्रेणी में रख कर नहीं देखा जा सकता! समाज के बहुत सारे लोग लंबे समय से कानून के दायरे में शांतिपूर्वक गोरक्षा कर रहे हैं! जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई हैए कुछ लोगों द्वारा गोरक्षाए धर्मांतरण आदि के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किया जा रहा है! गोरक्षा के बहाने मवेशियों का कारोबार करने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के बहुत सारे लोगों को सरेआम मारा.पीटा गया उनमें से कई की मौत हो गई! इसी तरह मरे हुए पशुओं का चमड़ा उतारने वाले दलित समुदाय के लोगों को प्रताड़ित किया गया! ऐसी घटनाओं से भाजपा के प्रति रोष बढ़ा है!

आरएसएस की आज जो स्थिति है यहां तक पहुंचना उनके लिए कतई आसान नहीं रहा! महात्मा गांधी की हत्या के तत्काल बाद 4 फरवरीए 1948 को सरकार ने इस संगठन पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया कि बापू के हत्यारे संघ से जुड़े थे! हालांकि सरकार को एक साल बाद ही अप्रैलए 1949 में यह प्रतिबंध हटाना पड़ा! इसके बाद आपातकाल के दौरान एक बार फिर इसे प्रतिबंधित किया गया! लेकिन सत्ता परिवर्तन ;जनता पार्टी शासनद्ध के साथ प्रतिबंध हटा दिया गया! दरअसलए पहले प्रतिबंध से संघ को गहरा झटका लगा थाए क्योंकि तब जनमत भी पूरी तरह उसके खिलाफ हो गया था! इसके बावजूद उसने खुद को फिर खड़ा किया! संघ का अड़ियल रवैया भी बदला है और यदि कोई काम उसकी इच्छा के विपरीत हो भी रहा है तो वह उग्र होने के बजाय उसे शांतिपूर्ण ढंग से करने को प्राथमिकता दे रहा है! इसकी एक वजह नरेन्द्र मोदी खुद हैं!

संघ से जुड़े लोगों को मोदी ने अच्छे पद देने में भी कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है! देश में भाजपा पहली राजनीतिक पार्टी थीए जिसने पिछले चुनावों में वायदा किया था कि सत्ता में आने पर वह समान नागरिक संहिता कानून बनाएगी! भाजपा सरकार ने 2016 में विधि आयोग से कहा कि वह समान नागरिक संहिता लागू करने के मुद्दों पर कानूनी प्रारूप तैयार करे! संघ के सदस्यों की सत्ता में मौजूदगी की बात की जाए तो सबसे पहले गिनती नरेन्द्र मोदी से ही शुरू करनी होगी! मोदी खुद संघ के पूर्णकालिक प्रचारक रहे हैं!

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