आग का तांडव ऐसा कि पिघल सकते हैं ग्लेशियर

आग का तांडव ऐसा कि पिघल सकते हैं ग्लेशियर

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नई दिल्ली। उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग से हिमालय के ग्लेशियर्स पिघल सकते हैं। आग से ओजोन लेयर पर सीधा असर पड़ रहा है। चार से पांच बड़े शहरों में एक साल में पॉल्यूशन के चलते एन्वायर्नमेंट को जितना नुकसान पहुंचता है, उतना असर इस आग से दो घंटे में ही हो रहा है। बता दें कि उत्तराखंड के सभी जिलों के जंगलों में 90 दिन से आग लगी हुई है। यह अब हिमाचल तक भी फैल चुकी है। ग्लेशियर्स पर कैसे असर डालेगी जंगल की आग…
– नैनीताल के आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर ऑब्जर्वेशनल साइंसेस (एआरआईईएस) और अल्मोड़ा के गोविंद बल्लभ पंत इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एन्वायर्नमेंट एंड डेवलपमेंट (जीबीपीआईएचईडी) ने कहा कि धुएं और राख में मौजूद कार्बन ग्लेशियर्स को कवर कर चुका है।
– एक्सपर्ट्स का कहना है कि जंगलों में आग ने नॉर्थ इंडिया में टेम्परेचर 0.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है। इससे माननून पर भी असर पड़ सकता है।
– साइंटिस्ट किरीट कुमार ने कहा, ‘‘ब्लैक कार्बन हवा में लंबे वक्त तक तैरता है। बादलों में जमा रहता है।‘‘
– इससे यह मानसून साइकल को भी अपनी चपेट में ले लेता है और प्रभावित करता है।‘‘
– कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि ब्लैक कार्बन के बादलों के साथ मिलने से अलग-अलग नतीजे निकल सकते हैं।
किन ग्लेशियर्स पर असर
गंगोत्री, मिलाम, सुंदरदुंगा, नेवला और चीपा के ग्लेशियर्स पिघल सकते हैं। इस वजह से नॉर्थ इंडिया की कई नदियों पर भी असर पड़ सकता है।
मुश्किल में नेशनल पार्क
– आग की वजह से केदार, जिम कार्बेट और राजाजी नेशनल पार्क में भी असर देखा जा रहा है।
– जिम कार्बेट नेशनल पार्क का 198 एकड़ इलाका आग की चपेट में आ चुका है।
– वहीं, राजाजी के 70 और केदारनाथ का 60 एकड़ इलाके पर आग ने असर डाला है।
– अफसरों के मुताबिक, आग बढ़ने की वजह से वन्य प्राणी रिहायशी इलाकों की तरफ जा रहे हैं।
2 फरवरी को सामने आई थी पहली घटना
– फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के मुताबिक, गर्मी के दिनों में जंगल में आग लगना आम बात है। लेकिन इस बार यह बड़े स्केल पर देखी गई।
– आमतौर पर यहां के जंगलों में ‘फायर सीजन‘ 15 फरवरी से शुरू होकर 15 जून तक चलता है।
– रिपोर्ट की मानें तो 2 फरवरी को जंगल में लगी आग से दो महिलाओं की मौत हो गई थी। ऐसा माना जा रहा है कि जंगल में तभी से आग लगनी शुरू हुई।
इस बार इतनी क्यों भड़की आग?
– राज्य के 1900 एकड़ में आग सूखा मौसम, तेज गर्मी और तेज हवाओं के चलने की वजह से फैली।
– जानकारों के मुताबिक, गर्मी के दिनों में इन इलाकों में बारिश हो जाती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं।
– एडमिनिस्ट्रेशन ने भी आग की इन घटनाओं को सीरियसली नहीं लिया और धीरे-धीरे ये जंगलों में फैलती रही।
– इस वजह से पौड़ी, गढ़वाल, नैनीताल, पिथौड़ागढ़, बागेश्वर और चमौली में हालत बेहद खराब हैं। इन जिलों में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है।
– चिंता की बात यह है कि अब यह आग हिमाचल और जम्मू-कश्मीर तक पहुंच गई है। 91 दिन गुजर चुके हैं, उत्तराखण्ड के 13 जिलों में धधक रही आग पिछले 48 घंटे में दो गुनी से ज्यादा उस समय फैल गई जब वायु और थल सेना के जवान युद्ध स्थिति की तरह जूझ रहे हैं।
यूं तो उत्तराखण्ड के अलावा हिमाचल और जम्मू कश्मीर के जंगल भी आग से धू धू कर जलने लगे हैं मगर उत्तराखण्ड राज्य के जंगल धधकते हुए आज 3 महीने पूरे हो चुके हैं। दैवीय आपदा की स्थिति बन चुकी आग जहां वन संपदा नष्ट कर देने पर आमादा है वहीं सौदागर मुख्यमंत्री हरीश रावत के अलावा कई हफ्तों का समय राज्यपाल के.के.पौल शासन भी कटघरे में आ चुका है।
कहने को खनन और वन संपदा के सिवा पहाड़ में कोई दूसरा जरिया नहीं है मगर जनता की सरकार हो या राष्ट्रपति शासन वन माफियाओं, लकड़ी तश्करों के सामने सब व्यवस्था बौनी साबित हुई है। हम किसी पर ऊंगली नहीं उठा रहे, आग आपदा कैसे घटी यह भी हकीकत कहीं और है मगर 1 हजार से ज्यादा आगजनी की घटनाओं से यह स्पष्ट हो गया है कि शासन, सरकार या राज्यपाल दफ्तर आग आपदा की व्यवस्था के लिए सभी लंगड़े साबित हुए हैं। 10 हजार से ज्यादा लोग आग की लपटों का सामना कर रहे हैं। वायु सेना के विमान जहां नदी की गहराई से पानी ढो ढोकर बारिश कर रहे हैं वहीं एनडीआरएफ और थल सेना जमीन पर आगजनी का डटकर सामना कर रही है। यूं तो नैनीताल जिले में आग लगाते हुए आज दो आरोपी दबोचे गए हैं, हिमाचल की मण्डी क्षेत्र के रहने वाले दोनो आरोपियों से पूछताछ की जा रही है मगर अरबों की संपदा नष्ट हो जाने के बाद संपूर्ण वायुमंडल खराब करा देने पर आमादा हुक्मरान और अफसरशाही अब किस घड़ी का इंतजार करेगी यह सवाल पर्यावरण के अलावा देश वासियों के उस जीवन से जुड़ गया जहां सांस लेने वाली हवा पूरी तरह जहरीली कर दी गई। यूं तो चमोली, पौड़ी, रूद्रप्रयाग, टिहरी, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागड़ और नैनीताल सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में से हैं जहां वायुमंडल पूरी तरह जहरीला ही नहीं हुआ बल्कि रोगी और बुजुर्गो के अलावा मासूमों के लिए सांस लेना दूभर साबित हो रहा है। यूं तो जंगल में हजारों बेजुबान चिडि़या पंक्षी की जान खतरे में है मगर प्राणी और जमीन पर रेंगने वाले सैकड़ों तरह के जीव जंतु भी नष्ट हो चुके ही बताए जा रहे हैं। एनडीआरएफ की तीन और एसडीआरएफ की एक कंपनी राज्य के अलग-अलग हिस्सों में आग बुझाने में व्यस्त हैं। भारतीय वायुसेना के दो हेलीकॉप्टरों को नैनीताल और पौड़ी जिलों में भेजा गया है ताकि वे जल रहे जंगलों में पानी की बौछार कर सकें। नैनीताल के घोड़ाखाल और गढ़वाल में एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर जंगलों में पानी गिराकर आग को बुझाने में लगे हुए हैं।
सैटेलाइट के जरिए उत्तराखंड के जंगलो की आग का पल पल अपडेट लिये जाने की खबरें पलपल में आ रही है। इस वक्त करीब 2876 हेक्टेयर का जंगल आग में धधक रहा है। ये आग उत्तराखंड के 13 जिलों में फैली हुई है। अब तक आग के करीब 1000 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। यूं तो उत्तराखंड के ही जंगलों में एक महीने में आग लगने की एक हजार से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं. इनमें अब तक लगभग 2900 हेक्टेयर से ज्यादा वनक्षेत्र तबाह हो चुका है। इस साल लगी आग जंगलों में अब तक की सबसे भीषण आग है. उत्तराखंड के जंगलों में 1992, 1997, 2004 और 2012 में भी बड़ी आग लगी थी मगर दो आरोपी आज नैनीताल जिले में आग लगाते हुए उस समय धरे गए जब भारतीय सेना वन संपदा बचाने के लिए करो या मरो की स्थिति से जूझ रही है।

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