क्या दीवाली ही कारण है प्रदुषण का ?

क्या दीवाली ही कारण है प्रदुषण का ?

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आज प्रदुषण के मामले में दिल्ली का नाम दुनिया के कई शीर्ष शहरों में से एक है! जिसके चलते  सरकार ने इससे निजात पाने के लिए कई पुख्ता क़दम उठाये है! चाहें फिर सम – विषम फार्मूला हो, पर्यावरण सुरक्षा नियम या ऐतिहासिक स्मारकों पर प्लास्टिक की पाबंदी परन्तु दीवाली आते ही प्रदुषण समस्या से निपटने के लिए कड़े नियम और सुरक्षा को अपनाया जाता है! लेकिन ये मामला सिर्फ़ दीवाली में जलने वाले पटाख़े और उनसे होने वाले वायु प्रदूषण का नही बल्कि उससे कई गुना बड़ा है!

सरकार दीवाली में पटाखे न जलाने के लिए जनता को प्रोत्साहित कर रही है पर प्रदुषण का ये मामला सिर्फ पटाखों के धुएं तक सिमित नहीं है! दिल्ली से सटे राज्यों, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में फसल की कटाई के बाद खेतों में जलाए जाने वाले फुआल का भी इसमें ख़ासा योगदान है! पर्यावरण मामलों की संस्था सीएसई की जाँच के अनुसार 7 से लेकर 24 अक्तूबर के बीच 77% दिनों में दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर ‘काफ़ी खराब’ रहा है! अब आने वाले दिनों में ये स्तर बढ़ सकता है क्योंकि दीवाली आ रही है!

जानकारों की माने तो स्थिति बेहद चिंताजनक है और इस समस्या का सीधा असर स्वास्थ्य पर पड़ेगा! प्रदूषण के स्तर में पीएम-10 नामक कण की मात्रा इस धुएं के कारण बुरी तरह बढ़ती है और ये सीधे फेफड़ों पर असर करता है! कुछ दिन पहले दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण के मामले पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने यूपी, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान सरकरों से पूछा था कि फ़सल जलाने ( क्रॉप बर्निंग) को लेकर उनकी क्या तैयारियां हैं!

जबकि दिल्ली सरकार ने अदालत में पिछले कुछ वर्षों की सैटेलाईट तस्वीरें वाली एक रिपोर्ट पेश की जिसमें कथित तौर से क्रॉप बर्निंग को प्रदूषण या स्मॉग की बड़ी वजह बताया गया है! हालांकि, अमृतसर, पंजाब में किसानों का कहना हैं कि उनके पास फुआल जलाने की मजबूरी के अलावा कोई चारा नहीं! किसान इस बात से अनभिज्ञ नहीं कि भूसे को जलाने से वायु प्रदूषण होगा! लेकिन कटाई अब मशीन से होती है और उसके बाद फुआल जलाना ही सबसे सस्ता विकल्प है! ऑप्शन भी नहीं है क्योंकि पहले से ही ज़्यादातर किसान कर्ज़े में हैं!

खेतों में क्रॉप बर्निंग के मामले पर सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल भी रोक लगा चुके हैं और इसके बाद से राज्य सरकारों ने भी इस पर सख़्ती बरतनी शुरू की है! लेकिन मामला सिर्फ़ दूर-दराज के खेतों में जलाए जाने वाले फुआल का ही नहीं है और दिल्ली-एनसीआर में भी कूड़े को जलाने की समस्या अभी भी बनी हुई है!

इसी वर्ष जनवरी में सरकार ने ऐसा करने पर 15,000 से लेकर एक लाख रुपए तक का जुर्माना लगाने का नियम बनाया था लेकिन दिल्ली, नोएडा और गुड़गांव में अभी भी इसकी तमाम शिकायतें सुनाई पड़ती हैं! इन सभी कारणों को बढ़ावा देने का काम मौसम कर सकता है जिसमें वायु प्रदूषण से निजात मिलना फ़िलहाल तो मुश्किल लग रहा है! वजह है वेस्टरली या पश्चिम से चलने वाली हवाओं के बदले अब ईस्टरली यानी पूरब से चलने वाली हवाओं का आगमन हो चुका है! जानकारों के मुताबिक़ इस मौसम में प्रदूषण के कण हवाओं में मिल कर ठहराव की स्थिति बना देते हैं जिससे खांसी और सांस लेने में दिक्कत हो सकती है और दमे की बीमारियां बढ़ सकती हैं!

pradushan इसमें स्कूली बच्चों ने भी एक कैंपेन जारी किया है जिसमें न सिर्फ वायु बल्कि ध्वनि प्रदूषण के भी नुकसान बताए जा रहे हैं! रहा सवाल धुएं से होने वाले वायु प्रदूषण का तो क्रॉप बर्निंग, कूड़ा जलाना और पटाखों से तो सबसे ज़्यादा खतरा बना हुआ है! इन सभी वजहों से सल्फ़र जैसे ज़हरीले कण हवा में मिल जाते हैं जो स्वस्थ से स्वस्थ व्यक्ति को भी बीमार कर सकते हैं!

बहराल, अब जब दीवाली करीब है तो इस बात कि चिंता अपने चरम पर है कि वातावरण में प्रदूषण का स्तर क्या है! लेकिन असल चिंता ये भी है कि हर वर्ष दीवाली के पहले ही इस पर विचार ज़्यादा क्यों होता है चांहे फिर पूरा साल कुछ भी समस्या हो! हमें सिर्फ दीवाली ही नहीं बल्कि हर दिन पर्यावरण को सुरक्षित रखने की कोशिश करना चाहिए!

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