नोटबंदी का असर, चुनावों पर

नोटबंदी का असर, चुनावों पर

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नोट बन्द होने का असर चुनावों पर अधिक पड़ेगा! इसका प्रभाव अभी से देखा जा सकता है! चारों तरफ परेशानी का आलम है! बयान बाजी का दौर थम नहीं रहा! जनता परेशान है वो अलग अब ऐसे में देखना ये होगा की बी जे पी के अलावा बाकी पार्टी क्या कदम उठाती है! 500 और 1000 के नोटों को वापस लेने का प्रभाव उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर स्पष्ट रूप से पड़ेगा! इसका असर अभी से ही साफ दिख रहा है! इन नोटों को वापस लेने के बाद उत्तर प्रदेश में नेताओं की बयानबाजी शुरू हो गई है! इनके बयानों से साफ जाहिर होता है कि ये भगदड़ की स्थिति में हैं! इलेक्शन के वक्त में इनके पांव तले से ज़मीन खिसक गई है!
चुनाव का वक्त नज़दीक है और सम्भव हे की कई नेताओं के पास हज़ारों करोड़ का कैश पड़ा था! इन नकदी पैसों का इस्तेमाल होना भी शुरू हो गया था! लेकिन अब सब कछु व्यर्थ है! इन नोटों को अचानक से वापस लिए जाने के बाद इन्हें एकदम से समझ में नहीं आ रहा है कि आने वाला चुनाव कैसे लड़ा जाएगा!

अभी जो मायावती और समाजवादी पार्टी की रैली हुई थी उसमें पानी की तरह पैसे बहाये गए थे! दोनों की रैलियों में तमाम गाड़ियां बिना नंबर प्लेट्स की दिख रही थीं! सारी गाड़ियां बिल्कुल नई और ब्रैंडेड थीं! कहा जा रहा है कि इन गाड़ियों की खरीद नकदी हुई थी! यहां तक सुनने में आया है कि एक पार्टी में पार्टी प्रमुख तो पैसे लेकर टिकट बांट रहे हैं! कहा जाता है कि उस पार्टी में एक टिकट 50 लाख से चार करोड़ तक में बेचा जाता है! लोगों ने टिकट के लिए पहले पैसे दे दिए थे उनसे पैसे वापस लेने को कहा गया है! उनसे कहा गया है कि यदि टिकट चाहिए तो नई करेंसी दो! इन्होंने कहा कि वे नई करेंसी कहां से दें तो कहा गया कि सोना और डायमंड दे जाओ! उत्तर प्रदेश में यह आम चर्चा है!

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ये बात कितनी सत्य है कुछ कहा नहीं जा सकता पर सू़त्र तो इस तरफ इशारा कर रहैं है! यहां तक कि बीजेपी वाले भी परेशान हैं! उनके साथ दिक्क़त यह है कि वे खुलकर विरोध भी नहीं कर सकते हैं! क्योंकि उन पर ज्यादा गाज गिरेगी! आखिर सच बोलें भी तो कैसे? सारी सियासी पार्टियों का स्थिति पतली है क्योंकि पूरा चुनाव ब्लैक मनी के दम पर ही लड़ा जाता है! इस बात से हर कोई अवगत है! इस बार चुनाव जैसे 50 और 60 के दशक मे होता था वैसा ही हो सकता हैए क्योंकि ब्लैक मनी के बगैर वैसी ही स्थिति बन रही हैण् तब लोग ज़मीन पर उतरते थे और घर.घर जाकर मिलते थे!

उम्मीदवार ऐसा चुनावी अभियान चलाते थे जिसमें पैसों की बर्बादी नहीं होती थी! शराब नहीं बांटी जाती थी! ग़लत हरकतें नहीं होती थीं और न ही बंद़ूकों का इस्तेमाल होता था!
इस बार ऐसा लग रहा है कि चुनाव उसी दौर में लौटकर जाएगा! ज़ाहिर है इसका साफ असर पड़ेगा! यह मौका है जब दिखलाया जा सकता है कि बिना ब्लैक मनी के भी चुनाव लड़ा जा सकता है! भारत में चुनाव बेहद खर्चीला हो गया है! यह बात किसी से छुपी नहीं है की टिकट लेने के लिए जब लोग एक.एक करोड़ रुपये दे रहे हैं तो उसी से खर्च का अंदाज़ा लगाया जा सकता है!

एक उम्मीदवार तीन से चार करोड़ रुपये खर्च करता है! लोकसभा में इसके तीन से चार गुना ज़्यादा खर्च होता है! जब एक उम्मीदवार पांच करोड़ रुपये विधायक बनने के लिए खर्च करता है तो उसका पहला उद्देश्य होता है कि इन पैसों की वसूली की जाए! पहले वह पांच करोड़ रुपये वसूलने की जुगत में रहता है फिर उसे डबल करना चाहता है! पांच साल का कार्यकाल इसी में निकल जाता है! वह अपनी तिजोरी भरने में लगा रहता है और लोगों के बारे में सोचने की फुरसत ही नहीं मिलती! इसी का नतीजा है कि उत्तर प्रदेश की स्थिति इतनी बदतर है! यह स्थिति हर पार्टी पर लागू हो रही है!

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