सुरों की मालिक बेगम अख्तर

सुरों की मालिक बेगम अख्तर

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भारत में बहुत कम ग़ज़ल गायकों को इतना सम्मान मिला है जितना बेगम अख़्तर को! उनकी शास्त्रीय संगीत पर पकड़, उर्दू शायरी की समझ, ग़ज़ब की आवाज़ और ज़बरदस्त गायकी जैसा हुनर किसी के पास नहीं! तीस के दशक में, जब बेगम अख़्तर ने कोलकाता में स्टेज पर पहली बार अपना गायन पेश किया था! यह कार्यक्रम बिहार के भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए आयोजित किया गया था! उस दिन उन्हें सुनने वालों में भारत कोकिला सरोजिनी नायडू भी थीं! वह उनसे इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने स्टेज के पीछे आ कर उन्हें न सिर्फ़ बधाई दी बल्कि बाद में एक खादी की साड़ी भी उन्हें भिजवाई!

पांच फ़ुट तीन इंच लंबी बेगम अख़्तर हाई हील की चप्पलें पहनने की भी शौक़ीन थीं. यहाँ तक कि वो घर में भी ऊँची एड़ी की चप्पलें पहना करती थीं! घर पर उनकी पोशाक होती थी मर्दों का कुर्ता, लुंगी और उससे मैच करता हुआ दुपट्टा.बेगम की शिष्या शांति हीरानंद कहती हैं कि रमज़ान में बेगम अख़्तर सिर्फ़ आठ या नौ रोज़े ही रख पाती थीं क्योंकि वो सिगरेट के बग़ैर नहीं रह सकती थीं! इफ़्तार का समय होते ही वो खड़े खड़े ही नमाज़ पढ़तीं, एक प्याला चाय पीतीं और तुरंत सिगरेट सुलगा लेतीं! दो सिगरेट पीने के बाद वो दोबारा आराम से बैठ कर नमाज़ पढ़तीं!

उनको खाना बनाने का भी ज़बरदस्त शौक़ था! बहुत कम लोग जानते हैं कि उनको लिहाफ़ में गांठें लगाने का हुनर भी आता था और तमाम लखनऊ से लोग गांठे लगवाने के लिए अपने लिहाफ़ उनके पास भेजा करते थे!

वो अक्सर कहा करती थीं कि ईश्वर से उनका निजी राबता है! जब उन्हें सनक सवार होती थी तो वो कई दिनों तक आस्तिकों की तरह कुरान पढ़ती रहती थी! लेकिन कई बार ऐसा भी होता था कि वो कुरान शरीफ़ को एक तरफ़ रख देती थीं!

एक बार वो एक संगीत सभा में भाग लेने मुंबई गईं! वहीं अचानक उन्होंने तय किया कि वो हज करने मक्का जाएंगी! उन्होंने बस अपनी फ़ीस ली, टिकट ख़रीदा और वहीं से मक्का के लिए रवाना हो गईं! जब तक वो मदीना पहुंची उनके सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे! उन्होंने ज़मीन पर बैठ कर नात पढ़ना शुरू कर दिया! लोगों की भीड़ लग गई और लोगों को पता चल गया कि वो कौन हैं! तुरंत स्थानीय रेडियो स्टेशन ने उन्हें आमंत्रित किया और रेडियो के लिए उनके नात को रिकॉर्ड किया!

bउन्होंने सत्यजीत राय की फ़िल्म ‘जलसाघर’ में शास्त्रीय गायिका की भूमिका भी निभाई थी! उर्दू के मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी से बेगम अख़्तर की गहरी दोस्ती थी! जिगर और उनकी पत्नी अक्सर बेगम के लखनऊ में हैवलौक रोड स्थित मकान में ठहरा करते थे!

बेगम के दोस्तों में जाने माने शास्त्रीय गायक कुमार गंधर्व भी थे! जब भी वो लखनऊ में होते थे तो वो अक्सर अपना झोला कंधे पर डाले उनसे मिलने आया करते थे! बेगम अख़्तर नहा कर अपने हाथों से उनके लिए खाना बनाया करती थीं. एक बार वो उनसे मिलने उनके शहर देवास भी गई थीं! तब कुमार ने उनके लिए खाना बनाया था और दोनों ने मिल कर गाया भी था!

फ़िराक़ गोरखपुरी भी उनके क़द्रदानों में थे! अपनी मौत से कुछ दिन पहले वो दिल्ली में पहाड़गंज के एक होटल में ठहरे हुए थे! बेगम उनसे मिलने गईं! फ़िराक़ गहरी गहरी सांस ले रहे थे लेकिन उनके चेहरे पर मुस्कान थी! उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल बेगम अख़्तर को दी और इसरार किया कि वो उसी वक़्त उसे उनके लिए गाएं! जब बेगम ने वो ग़ज़ल गाई तो फ़िराक़ की आंखों से आंसू बह निकले बेगम की मशहूर ग़ज़ल ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया…’ के पीछे भी दिलचस्प कहानी है!

एक बार जब वो मुंबई सेंट्रल स्टेशन से लखनऊ के लिए रवाना हो रही थीं तो उनको स्टेशन छोड़ने आए शकील बदांयूनी ने उनके हाथ में एक चिट पकड़ाई! रात को पुराने ज़माने के फ़र्स्ट क्लास कूपे में बेगम ने अपना हारमोनियम निकाला और चिट में लिखी उस ग़ज़ल पर काम करना शुरू किया!

भोपाल पहुंचते पहुंचते ग़ज़ल को संगीतबद्ध किया जा चुका था! एक हफ़्ते के अंदर बेगम अख़्तर ने वो ग़ज़ल लखनऊ रेडियो स्टेशन से पेश की और पूरे भारत ने उसे हाथों हाथ लिया!

जब अख़्तरी 11 साल की थीं तो उनकी माँ मुश्तरी उन्हें अपने साथ बरेली के पीर अज़ीज़ मियाँ के पास ले कर गई थीं! उनके हाथ में एक नोटबुक थी जिसमें तमाम ग़ज़लें लिखी हुई थीं!

पीर ने नोटबुक के एक पन्ने पर हाथ रखा और कहा कि इसे पढ़ो. अख़्तरी ने बहज़ाद लखनवी की उस ग़ज़ल को ऊँची आवाज़ में पढ़ा- ”दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे… वरना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे… ऐ देखने वालों, मुझे हंस हंस के न देखो… तुमको भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे…”

पीर साहब ने कहा, अगली रिकॉर्डिंग में इस ग़ज़ल को सबसे पहले गाना! अख़्तरी कलकत्ता पहुंचते ही अपनी रिकॉर्डिंग कंपनी के पास गईं… और दीवाना बनाना है… गाया.सारंगी पर उनकी संगत की उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ ने 1925 की दुर्गा पूजा के दौरान वो रिकॉर्ड रिलीज़ किया गया और उसने पूरे बंगाल में तहलका मचा दिया! उसके बाद से अख़्तरी फ़ैज़ाबादी उर्फ़ बेग़म अख़्तर ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा!

एक  किस्सा बहुत मशहूर है सिगरेट की वजह से ही उन्हें ‘पाकीज़ा’ फ़िल्म छह बार देखनी पड़ी थी. हर बार वो सिगरेट पीने के लिए हॉल से बाहर आतीं और जब तक वो लौटतीं फ़िल्म का कुछ हिस्सा निकल जाया करता. अगले दिन वो उस हिस्से को देखने दोबारा मेफ़ेयर हॉल आतीं. इस तरह से उन्होंने ‘पाकीज़ा’ फ़िल्म छह बार में पूरी की!

उनके ये किस्से बहुत मशहूर और दिलचस्प है उनकी ग़ज़लें आज भी लोगों के ज़ेहन में है ऐसी गायिका एक सदी में एक बार पैदा होतीं है!

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