क्या भारत की अर्थव्यवस्था बन सकती है कैशलेस?

क्या भारत की अर्थव्यवस्था बन सकती है कैशलेस?

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आठ नवंबर को नोटबंदी ने चारो तरफ अफरातफरी का माहौल बना दिया सारा देश इस बात को लेकर परेशान था कि अब रोजमर्रा की जरुरतों का सामना कैसे खरीदा जा सकेगा!

कुछ लोग पक्ष तो कुछ विपक्ष में खड़े हो गए! नोटबंदी के बाद से अब तक लंबी कतारों का सिलसिला लगातार चल रहा है! जबकि नोटबंदी का 32वां दिन है!

इस नोटबंदी ने लोेगों के शरीर में अजीब से शक्ति भी पैदा कर दी है लोग दिन रात भूल कर लगातार लाइनों में खड़े है और अपनी देशभक्ति का प्रमाण दे रहे हैं!

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नोटबंदी ने देश, देशभक्त, सेनिक, भष्ट्राचार, कालाबाजारी, कैशलैस व्यवस्था जैसे शब्दों के भण्डार को आम कर दिया है!

प्रधानमंत्री मोदी लगातार डिजिटल इंडिया के पक्षधर रहे हैं यह एक अच्छा अभियान भी है लेकिन देश को कैशलेस अर्थव्यवथा में झोंकने से पहले क्या ज़मीनी हकीकत देखी गई थी! डिजिटल भुगतान पर ज़ोर देने के लिए आज सरकार ने ढेरों रियायतें तो दे रखी है! पर क्या डिजिटल कैशलेस शब्दों का अर्थ सभी को पता है?

लगभग 70 वर्षों में हमारे बैंक ही जब ग्रामीण जनता तक ही नहीं पहुंच पाये हैं तो हम किस भरोसे जनता से डिजिटल होने की मांग कर रहे हैं!

डेबिट कार्ड क्रेडिट कार्ड और ई वॉलेट वाले बैंको की लाइनों में कम है! पर जिनका नकदी के बगैर गुजारा नहीं वो बिचारे लंबी लाइनों में कैश के लिए तरस रहें है!

अमेरिका जैसे उन्नत देश में भी अभी तक कैशलेस व्यवथा को नहीं अपना पाए हैं! पर भारत अपने ग्रामीण ये उम्मीद करता है कि वो कैशलेस व्यवस्था को पूरी तरह अपनाए!

तो बेहद अजीब बात है जहां देश को अभी तक कॉल ड्रॉप की समस्या से निजात नहीं मिल पाया है वहां पूरी तरह से डिजिटल और कैशलेस व्यवस्था लाने की बात की जा रही है

क्या देश में मोबाइल नेटवर्क और डेटा सर्विसेस का ऐसा जाल है जिसके दम पर हम डिजिटल इंडिया का दम भरते है?

 

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