3 अक्टूबर से सारनाथ में होगी अंतरराष्ट्रीय बौद्ध कॉन्क्लेव की शुरुआत

3 अक्टूबर से सारनाथ में होगी अंतरराष्ट्रीय बौद्ध कॉन्क्लेव की शुरुआत

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बौद्ध धर्म दुनिया के प्रमुख धर्मों में से एक है जिसके दुनिया भर में 50 करोड़ से भी ज्यादा अनुयायी हैं. हालांकि इस धर्म की शुरुआत भारत में हुई लेकिन धीरे-धीरे यह पूरी दुनिया में फैलता गया. बुद्ध के  विचार और उपदेश आज भी दुनिया में प्रासंगिक हैं. अंतरराष्ट्रीय बौद्ध कॉन्क्लेव का आयोजन उत्तर प्रदेश के सारनाथ में किया जाने वाला है.

दो दिवसीय सम्मेलन
सारनाथ वही जगह है जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त‍ि के बाद पहला उपदेश दिया था. इस दो दिवसीय सम्मेलन की शुरुआत 3 अक्टूबर को सारनाथ में की जाएगी, वहीं इसका समापन 5 अक्टूबर को बिहार के बोधगया में किया जाएगा. इस आयोजन में दुनिया भर से विचारक, दार्शनिक, बुद्धिजीवी और राजनीतिक प्रशासक सम्मिलित होंगे. उत्तर प्रदेश और बिहार के पर्यटनविभाग के सहयोग से पर्यटन मंत्रालय द्वारा आयोजित इस कॉन्क्लेव के उद्घाटन समारोह में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के शामिल होने की उम्मीद है.

40 से अधिक देशों के बौद्ध प्रतिनिधि लेंगे हिस्सा
इस सम्मेलन में 40 से अधिक देशों के बौद्ध और विदेशी प्रतिनिधि भी हिस्सा लेंगे. अब से पहले भी इस तरह के कई कॉन्क्लेव आयोजित किए जाते रहे हैं. गौरतलब है कि 2004 में नई दिल्ली और बोधगया, 2010 में नालंदा और बोधगया, 2012 में वाराणसी और बोधगया, 2014 में बोधगया और वाराणसी में भी ऐसे कॉन्क्लेव का आयोजन किया जा चुका है.

बौद्ध धर्म के इतिहास में उत्तर प्रदेश की ये जगहें हैं खास…

1. भगवान बुद्ध की जन्मभूमि कपिलवस्तु
कपिलवस्तु प्राचीन शाक्य राजघराने की राजधानी हुआ करती थी और इसी राज परिवार के शासक शुद्धोधन सिद्धार्थ के पिता थे. सिद्धार्थ ही आगे चल कर महात्मा बुद्ध कहलाये और उन्हें शाक्यमुनि के नाम से भी जाना जाता है. आज कपिलवस्तु क्षेत्र में कई गांव शामिल हैं जिनमे पिपरहवा, गांवरिया और सालारगढ़ मुख्य हैं.
कैसे पहुंचें: कपिलवस्तु, अलीगढ़वा ‘भारत-नेपाल’ सीमा से 97 किमी की दूरी पर गोरखपुर से उत्तर की ओर राज्य हाईवे 1-ए पर स्थित है. यह सिद्धार्थ नगर (नौगढ़) जिला मुख्यालय से 20 किमी की दूरी पर स्थित है जो की कपिलवस्तु के लिए अंतिम रेलवे स्टेशन है.

2. बौद्ध धर्म की तीर्थ सारनाथ
उत्तरप्रदेश में वाराणसी के पास सारनाथ एक छोटा सा गांव है. सारनाथ बौद्ध धर्म के तीर्थ स्थान के रूप में प्रसिद्ध है. भारत के राष्ट्रीय चिह्न चतुर्मुख सिंह स्तंभ की विशाल मूर्ति, भगवान बुद्ध का मंदिर, चौखंडी स्तूप आदि कई दर्शनीय और धार्मिक स्थलों के साथ सारनाथ अपने पुरातत्व महत्व के लिए भी प्रसिद्ध है. सारनाथ स्थित डियर पार्क में ही गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद पहला संदेश दिया था. पहले बौद्ध संघ की स्थापना भी यहीं की गई थी. सारनाथ में कई स्तूप हैं. इन्हीं में से एक है चौखंडी स्तूप, जहां बुद्ध की हड्डियां रखी गई हैं.
कैसे पहुंचें: सारनाथ वाराणसी के कैंट रेलवे स्टेशन से 8 किमी और वाराणसी से 6 किमी उत्तर की ओर स्थित है. सारनाथ में उत्तर रेलवे का एक छोटा स्टेशन भी है.

3. बौद्ध स्तूप में से एक है संकिसा
उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद जिले में संकिसा नामक स्थान पर बना बौद्ध स्तूप दुनिया के प्राचीन स्तूपों में से एक है. संकिसा की ख्याति इसी बौद्ध स्तूप से है. इसके बारे में एक बहुत रोचक कथा है कि भगवान बुद्ध की माता महामाया ने स्वर्ग में उनसे धर्मोपदेश लेना चाहा तो बुद्ध स्वर्ग गए. तीन माह उपदेश देने के बाद उन्होंने पृथ्वी पर जाने की इच्छा जताई तो देवराज इंद्र ने अपने योगबल से तीन बहुमूल्य सीढि़यां प्रकट कीं, जो क्रमश: बिल्हौर, सोने और चांदी की थीं. बुद्ध बीच वाली सीढ़ी से यहां संकिसा में ही उतरे थे. उनके दायीं ओर ब्रह्मा चांदी की सीढ़ी पर चंवर लेकर और इंद्र बायीं ओर बिल्हौर की सीढ़ी से बहुमूल्य छत्र थामे उतरे.
कैसे पहुंचें: फर्रूखाबाद रेलवे स्टेशन से संकिसा के लिए सीधी बस या टैक्सी मिलती है.

4. बौद्ध तीर्थ है श्रावस्ती
उत्तर प्रदेश प्रांत के गोंडा-बहराइच जिलों की सीमा पर यह प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ स्थान है. प्राचीन काल में यह कौशल देश की दूसरी राजधानी थी. श्रावस्ती बौद्ध व जैन दोनों का तीर्थ स्थान है. अब यहां बौद्ध धर्मशाला, मठ और मन्दिर हैं.
कैसे पहुंचे: रेल, बस और सड़क मार्ग से यहां पर आराम से पहुंचा जा सकता है.

5. गौरवशाली इतिहास की दास्‍तां कौशाम्‍बी
पुराने कौशाम्‍बी का इतिहास, रामायण और महाभारत के काल का है. यह जगह, महाभारत के 16 वें क्षेत्रों में से एक है जो वत्‍स महाजनपाद की राजधानी हुआ करती थी. इस स्‍थल का उल्‍लेख रामायण और महाभारत, पुराणों में भी मिलता है. कौशाम्‍बी को भारत में भगवान बुद्ध के जीवनकाल के 6 समृद्ध शहरों में से एक माना जाता है. इस शहर की खुदाई के दौरान कई पुराने सिक्‍के, मूर्तियां और अन्‍य सामग्री निकली, जो वहां के गौरवशाली इतिहास की दांस्‍ता बयां करती हैं. यहां के कुछ प्रमुख स्‍मारकों में अशोक स्‍तम्‍भ, एक जैन मंदिर, एक पत्‍थर का किला और गोसिता मठ है. इस जगह भगवान बुद्ध बोध ज्ञान प्राप्‍त होने के 6 और 9 वें साल में उपदेश देने आए थे.
कैसे पहुंचें: यह जगह रेल, बस और सड़क मार्ग से जुड़ी हुई और इस तरह यहां पर आराम से पहुंचा जा सकता है.

6. कुशीनगर जहां बुद्ध ने प्राप्त किया महा परिनिर्वाण
कुशीनगर एक बौद्ध धार्मिक स्थल है जहां पर गौतम बुद्ध ने महा परिनिर्वाण प्राप्त किया था. यहां पर कई प्राचीन स्तूप और मठ स्थित हैं. इनमें से कई स्थानों का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने कराया था. प्राचीन कुशीनगर खंडहर में तब्दील हो गया था लेकिन 19वी सदी में इस शहर का पुर्नविष्कार किया गया.
‘रामभर स्थल’ पर भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था. हर वर्ष बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर यहां एक मेला लगता है. यहां एक शानदार बौद्ध संग्रहालय भी है जिसमें कई बौद्ध वस्तुओं को रखा गया है. इन वस्तुओं का अध्ययन करने के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं.
कैसे पहुंचें: यह जगह रेल, बस और सड़क मार्ग से जुड़ी हुई और इस तरह यहां पर आराम से पहुंचा जा सकता है.

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