रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से क्यों निकालना चाहती है मोदी सरकार?

रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से क्यों निकालना चाहती है मोदी सरकार?

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हाल ही में म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या चरमपंथियों ने पुलिस चौकी पर हमला किया था जिसमें सुरक्षाबलों के 12 सदस्य मारे गए थे. इस घटना के बाद रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई शुरू हुई थी और रोहिंग्या शरणार्थी संकट उत्पन्न हो गया था. भारत के गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने घोषणा की थी कि भारत रोहिंग्या मुसलमानों को निर्वासित करेगा. रिजिजू ने कहा था कि इसमें 16,000 संख्या उन रोहिंग्या मुसलमानों की है जो संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थियों के तौर पर पंजीकृत हैं. उन्होंने कहा था, “यूएनएचसीआर रजिस्ट्रेशन का मतलब कुछ भी नहीं है. हमारे लिए वे सभी अवैध प्रवासी हैं.” 25 अगस्त को पुलिस चौकी पर हमले के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ी निंदा करते हुए बयान जारी किया था कि भारत आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में म्यांमार के साथ मज़बूती से खड़ा है. दोनों बयानों को देखकर लगता है कि यह 5 सितंबर से होने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के म्यांमार दौरे के मद्देनज़र दिए गए हैं.हमले के बाद शुरू हुई सैन्य कार्रवाई के बाद 10 हज़ार रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश भागकर गए हैं लेकिन इस मामले पर चीन की चुप्पी ने भारत को मदद दी. कुछ ऐसे ही सुर में बर्मा की मुख्यधारा का जनमत भी सोचता है.
यह अभी तक साफ़ नहीं है कि भारत इन रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार में भेजेगा या फ़िर बांग्लादेश में.
रोहिंग्या इस समय बिना राष्ट्र के हैं, न म्यांमार उन्हें स्वीकार करता है और बांग्लादेश ख़ुद ही लाखों रोहिंग्या शरणार्थियों का घर बन चुका है.

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रोहिंग्या मुसलमानों को निर्वासित करने का मुद्दा भारत के सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है जिस पर सोमवार को सरकार से जवाब मांगा गया था. इस पूरी घोषणा के पीछे का इरादा म्यांमार के कट्टर बौद्ध राष्ट्रवादियों के साथ जुड़ाव दिखाता है. भारत में मणिपुर यूनिवर्सिटी में म्यांमार स्टडीज़ सेंटर की अगुवाई करने वाले जितेन नोंगथॉबम ने बीबीसी से कहा, “जब बात मुस्लिमों को लेकर सोच की आती है तो बर्मा के राष्ट्रवादी और कट्टर बौद्ध मोदी और भाजपा के सियासी तंत्र को ख़ुद के ज़्यादा करीब पाते हैं.”
इसके साथ-साथ विशेष अभियानों में म्यांमार की सेना को ट्रेनिंग देने से जुड़ी भारत की योजनाओं को कुछ लोग रोहिंग्या चरमपंथियों के ख़िलाफ़ म्यांमार के भारत म्यांमार के सैन्य अधिकारियों के साथ अच्छे रिश्तें बनाना चाहता है क्योंकि उसे उम्मीद है कि ऐसा करने से भारत के पूर्वोत्तर इलाकों में सक्रिय चरमपंथियों के ख़िलाफ़ उसे मदद मिलेगी क्योंकि इनमें से कई म्यांमार के जंगलों में रहते हैं.
रिश्तों को और मज़बूत बनाने के लिए भारत वहां से रखाइन स्टेट में पोर्ट और वाटरवे प्रोजेक्ट तैयार कर रहा है. जल्द ही सितवे को भारत के मिज़ोरम में ज़िरिनपुरी से सड़क के रास्ते जोड़ने की प्रक्रिया भी पूरी हो जाएगी.
म्यांमार में भारतीय राजदूत विक्रम मिसरी ने बर्मा से छपने वाले एक अख़बार से कहा, “इस परियोजना से हमें भारत के पूर्वोत्तर को बाकी देश से जोड़ने में मदद मिलेगी लेकिन हम इसे म्यांमार को दे रहे हैं. हमारी मंशा म्यांमार के लिए सार्वजनिक संपत्तियां बनाना हैं, ना कि कमर्शियल एसेट जैसा कि कुछ देश कर रहे हैं.” भारत सक्रियता के साथ ज़्यादा से ज़्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना तैयार करने पर ध्यान कर रहा है ताकि ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी को कामयाब बनाया जा सके. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने साल 2014 में इसे रेखांकित किया था.
इस योजना के तहत भारत दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में अपना असर बढ़ाना चाहता है ताकि इस इलाके में लगातार बढ़ते चीनी प्रभुत्व का मुकाबला किया जा सके. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दौरे के दौरान बागन जाएंगे, जहां वह भूकंप के दौरान तबाह हुए प्राचीन मठ भी जाएंगे. भारत ने इस मठ का पुनर्निर्माण कराया था. मोदी रंगून के श्वेडागॉन मठ भी जाएंगे और एक स्थानीय स्टेडियम में सार्वजनिक रैली में भाग लेंगे.
इसका मक़सद म्यांमार में बस चुके भारतीयों के साथ-साथ वहां के स्थानीय निवासियों के साथ जुड़ाव दिखाना है.
म्यांमार पर नज़र रखने वाले बिनोद मिश्र ने बीबीसी को बताया, “यह संयोग नहीं है कि रिजिजू ने रोहिंग्या मुसलमानों को बाहर भेजने के लिए कहा है. रिजिजू खुद बौद्ध हैं और उन्होंने तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा के साथ विवादित राज्य अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया था.”
भारत में रोहिंग्या मुसलमानों पर रिसर्च करने वालीं अनीता सेनगुप्ता कहती हैं, “रोहिंग्या का वास्तविक निर्वासन ज़मीन पर होना कठिन है क्योंकि उनको किस देश में भेजा जाएगा यह साफ़ नहीं है लेकिन इसने मोदी के दौरे के पहले एक राजनीतिक हवा बनाने की कोशिश की है.”

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