गाय के नाम पर इस देश में सब कुछ जायज है

गाय के नाम पर इस देश में सब कुछ जायज है

47
SHARE

(सुभाष गाताडे)
पहलू खान नामक एक किसान को न्याय दिलाने के लिए सूबा राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक ऐतिहासिक धरने का आयोजन हो रहा है। राज्य विधानसभा के समक्ष आयोजित इस धरने के जरिए नूह, मेवात, हरियाणा के इस किसान की हत्या में शामिल लोगों को पकड़ने की, उसके परिवार को मुआवजा देने की तथा स्वयंभू गोरक्षकों के आतंक पर रोक लगाने की मांग की जानेवाली है। दरअसल हत्या हुए तीन सप्ताह बीत गए, मगर आज भी इस हत्या के मास्टरमाइंड पकड़े नहीं जा सके हैं।

मालूम हो कि पहलू खान को राजस्थान के बेहरोर के पास नेशनल हाईवे पर गोरक्षकों ने तब पीटा था जब वह अपनी दो सन्तानों के साथ दो पिकअप टक में गायों को खरीद कर ले जा रहे थे, जिसकी पक्की रसीद उनके पास थी। एक अप्रैल की शाम को हुए इस हमले में बुरी तरह घायल पहलू खान ने 3 अप्रैल को वहीं के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। गौरतलब है कि अब जबकि इस हत्या को लेकर राज्य सरकार की अकर्मण्यता उजागर हो रही है, यह बात भी सामने आ रही है कि किस तरह राज्य के वरिष्ठ मंत्राी ने आततायियों पर कार्रवाई करने के आदेश देने के बजाय पीड़ितों को ही दोषी ठहराने का काम किया था और सरकार पर दबाव बढ़ रहा है तो हत्या में संलिप्त इन ‘गोरक्षकों’ की छवि के साफसुथराकरण के प्रयास सामने आ रहे हैं। समाचार के मुताबिक अलवर में ऐसे पर्चे बंट रहे हैं जिसमें इन तमाम अभियुक्तों को ‘समाजसेवी’ बताया जा रहा है। इतना ही नहीं किसी राष्टीय महिला गोरक्षा दल की कमल दीदी को लेकर अग्रणी अख़बारों में ख़बर छपी है जिसमें उन्होंने हत्या में शामिल एक अभियुक्त की तुलना आज़ादी के आन्दोलन में शामिल इन्कलाबियों से की है। गोरक्षा दल की कमल दीदी हत्या में शामिल एक अभियुक्त को यह कहते हुए सुनायी दे रही है कि वही लोग ‘आज के भगतसिंह और चंद्रशेखर आज़ाद हैं। यह अकारण नहीं था कि गोरक्षकों के बढते आतंक का मसला पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय में भी चर्चा में रहा जब उसे केन्द्र तथा छह राज्य सरकारों को यह आदेश देना पड़ा कि वह तीन सप्ताह के अन्दर जवाब दाखिल करे। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अगुआईवाली तीन सदस्यीय पीठ तीन जनहितयाचिकाओं पर विचार कर रही थी, जिसमें यह कहा गया था कि इन राज्यों में ऐसे प्राणियों की सुरक्षा को लेकर ऐसे कुछ कानून बने हैं जो ऐसे स्वयंभू प्राणीरक्षकों के पक्ष में पड़ते हैं। यह छह राज्य हैं राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, झारखण्ड, महाराष्ट और कर्नाटक। कर्नाटक के अलावा बाकी सभी राज्यों में भाजपा की हुकूमत है। याचिका में बताया गया था कि प्राणियों की रक्षा के लिए कानून जैसे ‘महाराष्ट एनिमल प्रोटेक्शन एक्ट 1956 ऐसे लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने से रोकता है जिसे उन्होंने अच्छी नियत से अंजाम दिया हो। कुछ राज्यों में इसके तहत यह छूट मिली है कि वह कहीं की तलाशी ले सकते हैं या छापा डाल सकते हैं। अभी पिछले साल उना, गुजरात में हिन्दू शिवसेना से जुड़े गोरक्षकों द्वारा दलितों को पीटे जाने को लेकर जो आन्दोलन की स्थिति बनी थी, इस मसले पर बात करते हुए गुजरात सरकार के चीफ सेक्रेटरी जनाब जी आर ग्लोरिया ने गोरक्षा के नाम पर चल रही इसी गुंडागर्दी को रेखांकित किया था।

उन्होंने बताया था कि समूचे गुजरात में दो सौ से ऐसे गोरक्षा समूह उभरे हैं जो ‘अपने आक्रमण के चलते तथा जिस तरह वह कानून को अपने हाथ में लेते हैं उसके चलते कानून और व्यवस्था का मसला बने हैं।’ उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसे समूहों के खिलाफ हम सख्त कार्रवाई करनेवाले हैं क्योंकि भले ही यह ‘स्वयंभू गोभक्त हों मगर वास्तव में गुंडे हैं।’ /देखें, द हिन्दू, 22 जुलाई 2016/ पंजाब हरियाणा उच्च अदालत ने भी इसी बात को रेखांकित किया था। अदालत का कहना था कि ‘‘गोरक्षा की दुहाई देते हुए बने हुए कथित प्रहरी समूह जिनका गठन राजनीतिक आंकाओं एवं राज्य के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की शह पर हो रहा है, जिनमें पुलिस भी शामिल है, वह कानून को अपने हाथ में लेते दिख रहे हैं।’
अगर हम पहलू खान के प्रसंग की ओर फिर लौटें तो देख सकते हैं कि ‘स्वयंभू गोरक्षकों’ के हाथों हुई उनकी मौत राज्य का कोई पहला प्रसंग नहीं है। नागौर जिले की खिमसर तहसील के भरलोकी में अब्दुल गफफार कुरेशी तो ऐसे ही आततायियों ने पीट कर मार डाला था /30 मई 2015/ जब किसी ने यह अफवाह उड़ा दी कि मुसलमानों ने गायों को मार कर बीफ खाया है, जबकि ऐसी कोई बात नहीं थी। उसी तरह पिछले साल अक्तूबर 2016 में राजसमंद के बाज़ार से गायों को खरीद कर जा रहे बंजारों पर गोरक्षकों ने हमला किया जबकि खरीदी के दस्तावेज उनके पास उपलब्ध थे और हमलावरों को गिरफतार करवाने के लिए बंजारों को जोरदार आन्दोलन करना पड़ा। अभी बीते माह ही जयपुर का होटल रब्बानी को पुलिस, नगर निगम के अधिकारियों एवं गोरक्षकों की आपसी सांठगांठ के चलते सील कर दिया गया जब होटल में बीफ परोसे जाने की अफवाह उड़ायी गयी। वैसे गाय के नाम पर जनतंत्रा के तमाम मूल्यों को ताक पर रख कर फैलायी जा रही यह संगठित हिंसा बरबस पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में ईशनिन्दा के नाम पर फैलायी जा रही संगठित हिंसा की याद ताज़ा करती है।

जिस तरह पाकिस्तान में ईशनिन्दा का महज आरोप लगाना ही काफी होता है, बाकी जलाने फंूकने मारने का काम आहत भावनाओं की भरपाई के नाम पर आमादा उग्र इस्लामिस्ट समूह खुद करते हैं या करवाते हैं, वहीं हाल भारत में अब गाय को लेकर हुआ है। यहां भी महज हंगामा करना काफी है। वह सभी जो गोरक्षा या गोभक्ति के नाम पर अंजाम दी जा रही इस हिंसा को औचित्य प्रदान करते हैं या उसके प्रति अपनी आंखें मूंदे हुए हैं, उन्हें बस यही याद रखना चाहिए कि यह फिसलन भरा रास्ता भारत के ‘दूसरे पाकिस्तान’ बनने में परिणत होता दिखता है।

SHARE

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY