क्या बाबा संविधान से बढ़कर होते हैं ?

क्या बाबा संविधान से बढ़कर होते हैं ?

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(प्रभुनाथ शुक्ल)
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख संत गुरमीत राम रहीम को 15 साल पुराने यौन शोषण मामले में सीबीआई अदालत ने अपने एतिहासिक फैसले में शुक्दोरवार को दोषी करार दिया। फैसले के बाद बाबा के भक्तों ने जिस तरह उत्पात मचाया उस हिंसा में गृह मंत्रालय के अनुसार 31 लोगों की मौत हो गई जबकि काफी तादात में लोग घायल हुए । दिल्ली , हरियाणा और पंजाब में कानून – व्यवस्था विकलांग हो गई । रेलगाड़ी में आग लगा दिया गया । बस फूंक दी गई और मीडिया की ओबीवैन को आग के हवाले कर दिया गया । हलांकि जिस तरह से हरियाणाला और पंजाब में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चौकसी बरती जा रही थी उससे यह साफ हो गया था कि अदालत की तरफ से फैसला बाबा के खिलाफ जाएगा । फैसले के बाद बाबा को रोहतक जेल भेज दिया गया है ।

अदालत 28 अगस्त बाबा पर सजा का फैसला सुनाएगी । फ़िर बाबा के भक्त एक बार फ़िर किस तरह कानून और व्यवस्था को रौंदते हैं देखना होगा । इस निर्णय से यह बात साफ हो चली है कि कोई कितना बड़ा क्यों न हो वह कानून और संविधान के अलावा न्याय व्यवस्था से अलग नहीं है। पंचकूला पहुंच कर डेढ़ लाख से अधिक लोग सड़कों पर अपना डेरा जमा लिए। जिस पर हाईकोर्ट को तीन बार सुनवाई करनी पड़ी ।अदालत ने यहां तक कहा कि क्यों न राज्य के डीजीपी को हटा दिया जाए। सरकार कोर्ट को मुर्ख बना रही है ।  लेकिन इससे इतर सवाल खड़े हुए हैं । सबसे खास बात है कि क्या धर्म और आस्था की आड़ में सम्विधान और कानून बौना साबित हो जाएगा । राजनीति क्या संविधान और विधान का गलाघोंट रही है। धर्म, जाति, संप्रदाय पर सरकारों का लचीला रुख, कई सवाल खड़े करता है। हरियाणा के पंचकूला और दूसरी जगहों पर धारा तीन दिन पूर्व से धारा 144 लागू लगा दी गई थी। बावजूद बाब के समर्थक लाखों कि संख्या में कैसे पहुँच गए । राज्य में धारा 144 लागू होने के बाद इतनी संख्या में लोग कहां से पहुंच गए। देश में पहली बार ऐसा हुआ जब किसी भी अदालत के फैसला सुनाने के पहले सेना बुलाई गई हो और डोन, हेलीकाप्टर के अलावा कमांडो तैनात किए गए हों। एक बाबा ने दो राज्यों की पूरी व्यवस्था ठप कर दी। सुरक्षा की इतनी अपूतपूर्व किलेबंदी से यह बात साफ हो गई थी की फैसला डेरा सच्चा सौदा प्रमुख संत गुरमीत रामरहीम के खिलाफ जा सकता है। जिसकी वजह से पंजाब और हरियाणा की सरकारों को सतर्क किया गया था । क्योंकि जाट आंदोलन के दौरान खट्टर सरकार की ढ़िलाई से काफी नुकसान उठाना पड़ा था, लिहाजा अदालत वह स्थिति पैदा नहीं होना देना चाहती। खट्टर सरकार को कानून – व्यवस्था पर बार – बार आगाह कर रही थी । पंजाब और हरियाणा की राजनीति में बाबा की अच्छी पकड़ है। स्वाल उठता है कि बाबाओं पर सरकारें इतनी मेहरबान क्यों रहती हैं। उन्हें आस्था की आड़ में संविधान और विधान से खेलने की आजादी क्यों दी जाती है। बाबा हैं तो उन्हें सब कुछ करने की खुली छूट कैसे मिल जाती है। जिस संत के खिलाफ अदालत फैसला सुना रही हो, वह अदालत में किस लाव लश्कर के साथ पहुंचता है।

यह कैसी बिडंबना है। क्या एक आम आदमी के साथ भी ऐसी स्थियां बनती हैं। बाबाओं का रुतबा, उनकी आजादी क्या हमारे संविधान और कानून से बड़ी है। महिलाओं और आश्रम की साध्वीयों के यौन शोषण को लेकर बाबाओं, संतो और मठाधीश कई बार बदनाम हुए हैं । हम यह कत्तई नहीं कहते है कि यह बात सभी धार्मिक संस्थाओं और पीठाधीश्वरों पर लागू होती है, लेकिन अपवाद को भी खारिज नहीं किया जा सकता है। देश में ऐसी स्थितियां क्यों पैदा हुई। इसका जिम्मेदार कौन है। हरियाणा और पंजाब में लाखों की संख्या में सेना और अघ्र्ध सैनिक बल के जवान और सिविल फोर्स के जवान तैनात थे । सुरक्षा को लेकर सरकार सतर्क थी बावजूद हिंसा नहीँ रुक पाई । जिसका अंदेशा था वही हुआ । देश का संविधान और उसका विधान बाबाओ, राजनेताओं, धर्म, जाति, समूहों से परे क्यों है। भारत की सांस्कृति विभिन्नताओं यानी अनेकता में एकता की है। यहां हजारों जातीय, धार्मिक, आदिवासीय समूह, धार्मिक संस्थाएं, मठ, मंदिर, गुरुद्वारे, मकबरे हैं। देश के संविधान और कानून के मुताबित सभी को संवैधानिक दायरे में पूरी आजादी है। वह चाहे जीने की आजादी हो या फिर धार्मिक स्वत्रंता की। लेकिन हाल के कुछ सालों में भीड़, आस्था और धार्मिक आजादी के साथ संविधान और कानून को निगले में लगी है। गु

गुरुमित राम रहीम एक संत हैं और दुनिया में उनके पांच करोड़ से अधिक भक्त हैं। राजनेता चुनाव जीतने के लिए उनकी दुआ और आशीर्वाद लेते हैं। क्या इस लिहाज से वह न्याय व्यवस्था से परे हैं। वह कुछ भी करने को आजाद हैं। वह यौन शोषण करें या फिर जमीनों पर अतिक्रम, धर्म के नाम पर इस तरह बाबाओं को खुली छूट कब तक मिलती रहेगी। संविधान और कानून से वह खिलवाड़ कब तक करते रहेंगे। संत आशाराम बाबू, रामपाल सिंह, चंद्रास्वामी और न जाने कितने बाबाओं से राजनेताओं का संबंध जग जाहिर है। हमारी धार्मिक आस्था और अधिकार इतने अनैतिक क्यों हो चले हैं। एक बाबा पर यौन शोषण का आरोप लगता है। देश की सबसे विश्वसनीय संस्था सीबीआई जाँच के उस पर फैसला सुनाती है, और संत के समर्थक हिंसा और मरने मारने पर उतारु हो जाते हैं। जिसकी वजह से 31 लोगों की जान चली जाती है । क्या आपका यह दायित्व नहीं बनता है कि जिसे आप भगवान मान रहे हैं उसकी नैतिकता कितनी अनैतिक हो चली है। बावजूद आप देश की संविधान, काननू और व्यवस्था पर विश्वास नहीं जता रहे हैं। आस्था के नाम पर आप मोहरे बने हैं। खुले आम सड़कों पर नंगा प्रदर्शन कर रहे हैं। फिर देश, संविधान, कानून और व्यवस्था का मतलब ही क्या रह जाता है। जिस बाबा और संत से आप सदआचरण की संभावना कर रहे क्या वह आपके विश्वास पर खरा उतर सका । वह बाबा कम फिल्मी नायक अधिक साबित हुआ । फिर बगैर जांच परख के गुरु करना हमारी सबसे बड़ी मूर्खता होगी। बाबाओं, और संतो ंके नाम पर अगर इसी तरह लोगों को धार्मिक स्वतंत्रा की आजादी मिलती रहेगी फिर देश और उसके संविधान का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। अगर यह सिलसिला बंद नहीं हुआ तो लोकतांत्रिक व्यस्था भीड़ के हलाले होगी। जहां किसी भी तंत्र का कोई कानून लागू नहीं होता है सिर्फ बस सिर्फ हिंसा से नियंत्रण ही एक जरिया बचता है। उस स्थिति से हमें बचना होगा। देश जनादेश से चलता है, जनादेश आम जनता देती है बाबा नहीं देता है। राजनेताओं और राजनीति को यह बात भी समझनी होगी।

सिर्फ नारों से देश नहीं बदल सकता है। उसके लिए जमींन तैयार करनी होगी। हम संत राम रहीम, आसाराम, रामपाल सिंह और दूसरे बाबाओं से किस चरित्र निर्माण की उम्मीद कर सकते हैं। भाजपा सांसद साक्षी महाराज का बयान इसमे आग में घी का काम करेगा । देश की संसदीय व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदार व्यक्ति अगर गलत तरीके से संत और धर्म की व्यख्या करेंगे तो देश की दिशा क्या होगी । इस हिंसा के लिए उन्होंने खुद अदालत को जहाँ जिम्मेदार ठहराया वहीँ साध्वी के आरोपों को गलत बताया । धर्म की रक्षा इस तरह से नहीँ हो सकती । आखिर सेना तैनात कर, बिजली काट और कफयू लगा कर कब तक व्यवस्था और संविधान की रक्षा करते रहेंगे । इसका जवाब मिलना चाहिए ।

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